एक सच्चा कर्मयोगी
“निष्काम होकर नित्य पराक्रम करने वालों की गोद में उत्सुक होकर सफलता आती ही है । “
इंसान का मन तीन तरह के दशा में डूबा रहता है- सात्विक, तामसिक और राजसिक । राजसिक मन अहंकार व शासन की बात सोचता है लेकिन सात्विक मन शांति और प्रेम चाहता है । मन में तीनों तरह के विचार उठते हैं । मनुष्य को नकारात्मक विचारों पर नियंत्रण और सकारात्मक विचारों का विकास करना चाहिए ताकि वह जीवन में हर तरह की सफलता प्राप्त कर सके और एक अच्छा व्यक्तित्व बना सके ।
सारे नकारात्मक विचारों में से सबसे श्रेष्ठ है- लालच । जब मनुष्य लालच में आता है तो उसमें लोलुपता बढ़ जाती है । लालसा मनुष्य को अंधा बना देती है, उसे अपनी लालच के अलावा कुछ भी नहीं दिखाई देता है । एक लालची व्यक्ति जब अपना हर काम अंत परिणाम की मोह में करता है तो उसका जीवन सीमित हो जाता है ।
कर्मयोगी क्या होता है ? अगर कोई व्यक्ति इस धरती पर आया है तो वह कर्म अवश्य करेगा । पर केवल कर्म करने से इंसान स्वयं को कर्म योगी नहीं बुला सकता । अगर तुलना करी जाए तो एक कर्म योगी बाकी हर व्यक्ति से श्रेष्ठ होता है, एक सच्चा कर्म योगी अपना हर कार्य किसी तरह के लाभ या फायदा की उम्मीद किए बिना करता है । हिंदू धर्म में महाभारत के युद्ध के पहले दिन जब पांडवों में से तीसरे पांडव अर्जुन को युद्धभूमि में अपने ही परिवार के सदस्यों से लड़ने में संदेह आ जाता है तो उनका यह भ्रम दूर करने के लिए भगवान कृष्ण कर्म और कर्मयोगी पर एक महत्वपूर्ण शिक्षण देते है ।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
भगवान कृष्ण ने बोला-“ जो भी कर्म करो यह सोचकर करो कि वह परमात्मा को समर्पित होता है । अर्थात कर्म ही भक्ति है, कर्म ही पूजा है इसलिए फल का लाभ किए बिना मनुष्य को अपना कर्म पूरे मन से करना चाहिए और एक सच्चा कर्म योगी बनना चाहिए ।“
श्रीमद भागवत गीता में दिए गए ऐसे महत्वपूर्ण उपदेश पढ़ने से मनुष्य कठिन से कठिन परेशानियों का सामना करने में सफलता प्राप्त करता है ।
हमारे जीवन काल में ऐसे कई व्यक्ति हैं जो हमें एक सच्चे कर्मयोगी का उदाहरण देते हैं । परंतु मेरे जीवन में एक सच्चा कर्म योगी का सबसे अहम उदाहरण हमारे विद्यालय के चेयरमैन और संस्थापक डॉक्टर सत्य पौल जी देते हैं । वह बचपन से ही स्कूल की पढ़ाई में अति उत्तम थे, जब उनके पिताजी की मृत्यु हो गई थी तब उन्होंने अपने भाई बहनों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली थी । जीवन ने उनके तरफ कई कठिनाइयां भेजी थी, उन्हें बचपन मैं पोलियो हो गया था परंतु उन्होंने अपनी इस बीमारी को अपनी कमजोरी नहीं बनने दी । और अंधेरे में एक मशाल के समान उन्होंने सिर्फ अपने ही नहीं बाकी कई लोगों के जीवन में रोशनी फैलाई ।

अपने जीवन काल के अंत समय पर भी अपने कार्य के प्रति उनका समर्पण कम नहीं हुआ और एक सच्चे कर्म योगी की तरह वह अपना सपना साकार करने के लिए मेहनत करते रहें । आज उनकी मेहनत, कठिन परिश्रम, समर्पण और नेतृत्व के कारण एपीजे एजुकेशन सोसाइटी एक बड़ा नाम बन पाई है ।
उनके जीवन से हमें कई शिक्षा मिलती है पर उन में से सबसे महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति को बड़े सपने देखने से डर नहीं लगना चाहिए और उस सपने को सच बनाने के लिए किसी भी लाभ की उम्मीद किए बिना एक कर्म योगी की तरह निरंतर परिश्रम करना चाहिए ।
“तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा, तेरे सामने आसमाँ और भी हैं । “